किसान भाइयों के लिए सुनहरी जानकारी – तोरई की बेल कैसे लगाएं कि पैदावार 3 गुना बढ़े और जेब में ज्यादा मुनाफा आए”

तोरई की बेल कैसे लगाएं
तोरई की बेल कैसे लगाएं

तुरई एक ऐसी सब्ज़ी है जिसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि मार्केट में इसका भाव कभी ज्यादा गिरता नहीं है  अभी धारीदार लंबी तुरई ₹100–110 किलो बिक रही है, जबकि सफेद वाली तुरई ₹65–70 किलो में मिल रही है। इसकी खेती  करके किसान अधिक  मुनाफा प्राप्त कर सकते है आज हम आपको  तुरई की खेती की संपूर्ण जानकारी देंगे 

 बेल वर्गीय सब्ज़ियों का चयन क्यों करे 

बेल वाली सब्ज़ियां लगाने का मुख्य कारण है कम खर्च और कम पानी की ज़रूरत। बारिश के मौसम में महीने में 1–2 बार पानी देना ही काफ़ी है। मेहनत थोड़ी ज़्यादा रहती है क्योंकि मचान और जाल बांधना पड़ता है, लेकिन उसके बाद दवाई देना और तोड़ाई करना ही मुख्य काम बचता है।

तोरई की बेल कैसे लगाएं

तुरई की खेती का सही समय और बुवाई

तुरई लगाने का सही समय 1 जून से 15 जून है। इस समय बोने पर मार्केट अच्छा मिलता है और फसल बढ़िया चलती है। अगर अगस्त के बाद लगाई जाए तो सर्दी आने पर पौधा नहीं चलता और उत्पादन रुक जाता है।

तुरई की खेती की तैयारी और गड्ढे की तकनीक

खेत की जुताई करने के बाद मशीन से बेड तैयार किए जाते हैं। फिर करीब 8–10 फीट की दूरी पर 1×1 फीट के गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बारिश में पानी और खाद बहकर बाहर नहीं जाते, बल्कि पौधे को लंबे समय तक पोषण मिलता रहता है।

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तुरई की खेती में खाद और बुवाई

गड्ढों में  सड़ी हुई गोबर की खाद  डाली जाती है, साथ ही थोड़ा डीएपी और दवाई भी दी जाती है। बीज डालने के तुरंत बाद मिट्टी दबाकर हल्का पानी दे देते हैं ताकि नमी बनी रहे। एक गड्ढे में दूरी के अनुसार 3–5 बीज लगाए जाते हैं।

 तुरई की खेती में सिंचाई प्रबंधन

छोटे पौधों को हमेशा सुबह हल्का पानी देना चाहिए। अगर शाम को पानी देंगे तो तना गलने का खतरा रहता है। शुरुआत में 15–20 मिनट तक पानी देना काफी होता है, और जैसे-जैसे पौधे बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे पानी की मात्रा भी बढ़ा देनी चाहिए। ड्रिप सिस्टम सबसे अच्छा है, क्योंकि जरूरत के हिसाब से ही पौधे को पानी मिलता है।

तोरई की बेल कैसे लगाएं

 गबदाई और मचान विधि

बीज उगने के 20–25 दिन बाद गबदाई करके फिर से गोबर खाद डाली जाती है। बेल बढ़ते ही  मचान बनाना ज़रूरी है, जिससे बेल बारिश और घास से खराब नहीं होती। बेल जैसे ही ऊपर चढ़ती है, पौधा तेजी से बढ़ने लगता है।

तुरई की खेती में  रोग और कीट प्रबंधन

तुरई में मुख्य रूप से लीफ माइनर, सफेद मक्खी और छोटे कीट लगते हैं। लीफ माइनर की पहचान पत्तियों पर बनी सफेद लकीरों से होती है। कीट पौधों और फलों को नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए नियमित दवाई का छिड़काव ज़रूरी है। हर 15 दिन में फफूंदनाशी और कीटनाशक का छिड़काव किया जाता है।

हार्वेस्टिंग

बीज बोने के करीब 45–50 दिन बाद, यानी लगभग 25 जुलाई के आसपास पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है। इसके बाद हर दो दिन में तोड़ाई करनी पड़ती है। एक बीघा खेत से रोज़ाना औसतन 150 से 170 किलो तक तुरई मिल जाती है।

तुरई की खेती में खर्चा और मुनाफा

एक बीघे में तुरई लगाने का कुल खर्चा लगभग  ₹20,000  आता है। जबकि तीन महीने में फसल बेचकर आसानी से  ₹2–2.5 लाख तक की आमदनी  हो जाती है।

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